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आयुक्त की शक्तियां

61. आयुक्त, राज्य के भीतर -

क. निशक्त व्यक्तियों के फायदे के लिए कार्यक्रमों और स्कीमों के संबंध में राज्य सरकार के विभागों से समन्वय करेगा ।
ख. राज्य सरकार , द्वारा संवितरित निधियों के उपयोग को माॅनिटर करेगा
ग. निशक्त व्यक्तियों के अधिकारों और उनको उपलब्ध कराई गई सुविधाओं के संरक्षण के लिए कदम उठायेगा ।
घ. अधिनियम के कार्यन्वयन के संबंध में राज्य सरकार को ऐसे अन्तरालों पर, जो वह सरकार विहित करे, रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा और उसकी एक प्रति मुख्य आयुक्त को अग्रेषित करेगा ।

62. धारा 61 के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, आयुक्त, स्वप्रेरणा से या किसी व्यथित व्यक्ति के आवेदन पर या अन्यथा -

क. निशक्त व्यक्तियों के अधिकारों से वंचित किये जाने,
ख. समुचित सरकारों और स्थानयी प्राधिकारियों द्वारा निशक्त व्यक्तियों के कल्याण और उनके अधिकारों के सरंक्षण के लिए बनाई गई विधियांे, नियमों, उपविधियों, विनियमों, जारी किये गये कार्यपालक आदेशों, मार्ग दर्शक सिद्ान्तों या अनुदेशों के कार्यान्वित न किये जाने, से संबंधित मामलों के संबंध में परिवादों की जांच कर सकेगा और मामले को समुचित प्राधिकारियों के समक्ष उठा सकेगा ।

63. प्राधिकारियों और अधिकारियों को सिविल न्यायालय की कतिपय शक्तियों का होनाः-

(1) मुख्य आयुक्त और आयुक्तों को, इस अधिनियम के अधीन उनके कृत्यों के निर्वहन के प्रयोजन के लिए, निम्नलिखित विषयो की बाबत वही शक्तियाँ होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के अधीन किसी वाद का विचारण करते समय, किसी न्यायालय में निहित होती है, अर्थात्.-

(क) साक्षियों को समन करना और हाजिर कराना;
(ख) किसी दस्तावेज के प्रकटीकरण औरपेश किए जाने की अपेक्षा करना;
(ग) किसी न्यायालय या कार्यालय से किसी लोक अभिलेख या उसकी प्रति की अपेक्षा करना;
(घ) शपथ पत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना; और
(ङ) साक्षियों या दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना।

(2) मुख्य आयुक्त और आयुक्तों के समक्ष प्रत्येक कार्यवाही, भारतीय दंड संहिता की धारा 193 और धारा 228 के अर्थ में न्यायिक कार्यवाही होगी और मुख्य आयुक्त, आयुक्त, सक्षम प्राधिकारी को दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 195 और अध्याय 26 के प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा।

 

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अंतिम अद्यतन:23 Mar, 2014